कब खड़ी होगी संसद के आँगन में भोजपुरी: नृपेंद्र अभिषेक नृप

कब खड़ी होगी संसद के आँगन में भोजपुरी: नृपेंद्र अभिषेक नृप

"भोजपुरियों की यही पुकार,भोजपुरी गुँजे संसद के द्वार।" भोजपुरी की संवैधानिक मांग एक बार फिर जोड़ पकड़ने लगा है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने स्थानीय भाषा भोजपुरी , मैथली , मगही और बांग्ला में ट्वीट किया है , जिसे इसी साल बिहार में और अगले साथ बंगाल में चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है। इससे एक बार फिर भोजपुरी भाषा चर्चा में आ गयी है, जिसे बोलने वाले दशकों से संविधान के 8 वी अनुसूची में शामिल करने की मांग करते आ रहे है। कुछ महीने पहले ही बिहार के मशहूर लिट्टी चोखा खा कर बिहार में चुनाव नजदीकी का संदेश दिया था। भोजपुरी भाषा के संवैधानिक दर्जा की मांग बहुत पुरानी है। 2014 लोकसभा चुनाव से पूर्व 2013 में जब मोदी जी पहली बार पटना के गाँधी मैदान में‌ भाषण दिए थे तब, फिर बिहार चुनाव 2015 में आरा, मुजफ्फरपुर एवं छपरा के सभा में भोजपुरी के संवैधानिक दर्जा के मांग को स्वीकार कर शामिल करने की बात कही थी।


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        भोजपुरी भाषा की उत्पति के संबंध में उदय नारायण तिवारी का कहना है कि इसका संबंध मागधी अपभ्रंश से है। इसके सम्बंध सूत्र में जहां भोजपुरी, मैथिली और मगही सहोदर बहने हैं वहीं बंगला, उड़िया एवं असमिया उसकी चचेरी बहने हैं। वहीं सुनीति कुमार चटर्जी का मानना है कि भोजपुरी, मैथिली एवं मगही से अलग भाषा है जिसे पश्चिम माग्धन के भीतर रखे हैं। सौरभ पांडेय सुनीति कुमार चटर्जी के बातों से सहमत होते हुए कहते हैं कि भोजपूरी का पश्चिमी माग्धन के भीतर होने की बात सही है। कारण कि भोजपुरी के भीतर पश्चिम के भाषा (उर्दू) की प्रभाव है। इसलिए मगही थोड़ी बहुत तो मैथिली, पुरी तरह से भोजपुरी से अलग है।

             लोकप्रिय भाषा भोजपुरी बोलने वालों की संख्या पुरे विश्व में लगभग 25 करोड़ है। दुनिया के लगभग सोलह देशों में बोली जाने वाली यह भाषा है। इस भाषा को भारतीय संविधान में शामिल करने की मांग बहुत पुरानी है जिसके लिए भोजपुरी की कई संस्थाएं आदोलन करती आई है। 2015 से भोजपुरी भाषा के संवैधानिक दर्जा के मांग हेतु समर्पित संस्था भोजपुरी जन जागरण अभियान के अध्यक्ष संतोष पटेल ने देश भर के संस्थाओं को एक करते हुए जंतर मंतर दिल्ली पर अब तक तेरह बार धरना प्रदर्शन कर चुकी है और प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री को ज्ञापन दे चुकी है। लगातार आंदोलन द्वारा मांग के बाद भी सरकार द्वारा इन मांगों पर अमल न करने से भोजपुरी भाषी को हमेसा निराशा ही मिलती है। भोजपुरी के वरिष्ठ साहित्यकार संतोष पटेल ने भोजपुरी के साथ हो रहे भेदभाव को खत्म कर के जल्दी से संविधानिक दर्जा देने की मांग की है। हजारों छात्रों ने भोजपुरी से एम ए और पी एच डी कर के मान्यता के इन्तेजार में बैठे है। युवा कवि और अभिनेता अभिषेक भोजपुरिया सरकार से सवाल पूछते हुए कहते है- "भोजपुरी से है कैसी दूरी,सरकार बोले क्या मजबूरी? हजारों छात्रों के रोजी रोटी का सवाल भोजपुरी के साथ जुड़ा है। आज भोजपुरी फ़िल्म उद्योग जिस तरह से लोगो के दिलो पर राज कर रहा है। "ऐसे में भोजपुरी को दर्जा समय की मांग है। भोजपुरी के लोक गायक रामेश्वरम गोप कहते है- " भोजपुरी भाषा को अगर संविधान में शामिल कर दिया जाय तो लोक गायकों को भी काफी फायदा होगा। परंतु किसी की भी सरकार रही हो, सिर्फ राजनीति हुई है और हम भोजपुरी लोकगायकों को अपने चुनावी फायदो के लिए मंच व अन्य तरीकों से गीत संगीत कर वोट लेने का काम करती रही है।" भोजपुरी के मशहूर गायक उदय नारायण सिंह ने भी संविधानिक दर्जा के अभाव में गायन उद्योग पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव की चर्चा करते हुए संविधानिक दर्जा की मांग करते हैं।वे कहते है-फिल्मफेयर अवार्ड में भोजपुरी क्षेत्रीय भाषा पुरस्कार में अपनी अलग पहचान बना सकती है। भोजपुरी के शामिल होने पर अकादमी पुरस्कार मिलने लगेंगे। भोजपुरी के विकास में अहम योगदान देने वाली "आखर" संस्था का भी 8वी अनुसूचित में शामिल करने की मांग वर्षो से ही रहा है। पूर्व राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के जयंती पर पंजवार में हर साल कार्यक्रम द्वारा अनवरत योगदान रहा है। अब जबकि भोजपुरी विभिन संगठनों के अनंत प्रयास से एक बहुचर्चित भाषा का रूप ले चुका है तो ऐसे में संविधान से दूर रखना न्यायोचित नही है।


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         लगातार आंदोलन द्वारा मांग के बाद भी भोजपुरी के शामिल न करने पर देवेंद्र कुमार कहते है कि गृह मंत्रालय में लागतार आवेदन दिया गया और और हमेसा से विभिन्न नेताओ से मिलने के बाद भी वादा तो मिलता है लेकिन अब तक दर्जा नही मिला। कई सालों से आंदोलन कर रहे राजेश भोजपुरिया का भी मानना यही है कि हमेसा से निराशा ही हाथ लगी है। हालांकि वर्षो से मांग कर रहे भोजपुरी के योद्धाओं ने अपनी संघर्ष निरन्तर जारी रखने की बात कही है। युवा कवि प्रेम विशाल के एक कविता में ही उनका भोजपुरी की मांग झलकता है - "सुनी आपन हक माँगत बानी रउरा के देवे के पड़ी, भोजपुरी के 8वीं अनुसूची में शामिल करे के पड़ी ।" लेकिन भोजपुरिया भाषी के दर्द को देख कर सबके मन मे प्रश्न उठा रहा है को भोजपुरी रोजी रोटी की भाषा न बन कर सिर्फ वोट की भाषा बन कर कब तक रहेगा? बिहार चुनाव के पूर्व अब भी उम्मीद है कि भोजपुरी को अपना हक मिलेगा।

  
         भोजपुरी भाषा की उत्पति के संबंध में उदय नारायण तिवारी का कहना है कि इसका संबंध मागधी अपभ्रंश से है। इसके सम्बंध सूत्र में जहां भोजपुरी, मैथिली और मगही सहोदर बहने हैं वहीं बंगला, उड़िया एवं असमिया उसकी चचेरी बहने हैं। वहीं सुनीति कुमार चटर्जी का मानना है कि भोजपुरी, मैथिली एवं मगही से अलग भाषा है जिसे पश्चिम माग्धन के भीतर रखे हैं। सौरभ पांडेय सुनीति कुमार चटर्जी के बातों से सहमत होते हुए कहते हैं कि भोजपूरी का पश्चिमी माग्धन के भीतर होने की बात सही है। कारण कि भोजपुरी के भीतर पश्चिम के भाषा (उर्दू) की प्रभाव है। इसलिए मगही थोड़ी बहुत तो मैथिली, पुरी तरह से भोजपुरी से अलग है।


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           भोजपुरी भाषा को भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग आज का नही बल्कि बहुत पुराना है। इस देश के बहुत से संगठनों ने भोजपुरी के संवैधानिक दर्जा के लिए दिल्ली के जंतर मंतर से ले कर राज्यों के जिला एवं प्रखंड स्तर तक धरना एवं बैठक कर चुके है, परन्तु वो सभी संगठन की संवैधानिक दर्जा की मांग की लड़ाई कोई धार नही दे पाई। बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के भोजपुरी विभागाध्यक्ष डा० जयकान्त सिंह जय का मानना है कि भोजपुरी भाषा, संस्कृति, क्षेत्र और जनता का विकास निमित्त भोजपुरी आंदोलन 1940 ई० में जनपदीय आंदोलन के रुप मे शुरु हुआ। इसके पीछे तीन तरह की विचार धारा काम कर रही थी। एक धारा भोजपुरी भाषा, लोक-साहित्य, कला, संस्कृति के अलावे इतिहास, भूगोल वगैरह से जुड़े विषय सामग्री को भोजपुरी के समक्ष हिंदी को देश दुनिया के समक्ष लाने के पक्षधर थे । उस धारा का अगुआ थे डा० बासुदेव शरण अग्रवाल जी । दुसरी धारा ‘जनपदीय साहित्य मंडल' का स्थापन कर इन सामग्रियों को भोजपुरी-हिन्दी भाषा में संग्रहित करा कर अध्ययन अनुसंधान कराने का हिमायती रहा। इस विचारधारा का संवाहक थे पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी जी। तीसरी धारा भोजपुरी के हर समस्या के समाधान के लिए भोजपुरी प्रांत बनाने पर जोड़ दे रहा था। उसके प्रबल और प्रखर पैरवीकार थे महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी।

          यह भाषा हमेशा से राजनीति की शिकार रही है। चाहें वो कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की। अब तक कि सभी सरकार ने बस भोजपुरिया जनता को झांसे में रखा। पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने सदन में‌ कहा था कि बहुत जल्द भोजपुरी संविधान में शामिल होगी पर नहीं कर पाए। सदन में भोजपुरी फिल्म अभिनेता व दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी, केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल एवं तत्कालीन गृहमंत्री एवं वर्तमान रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी भोजपुरी को 2018 में ही शामिल कर लेने की बात कही थी। परंतु आज तक किसी ने भी विधेयक लाने का काम नहीं किया। हालांकि 2019 लोकसभा चुनाव के बाद सदन के पहले सत्र में ही महाराजगंज सांसद जनार्दन सिंह सिग्रिवाल, पूर्व राज्यसभा सांसद आर के सिन्हा एवं ने सदन में सवाल उठाया तो वहीं गोरखपुर के सांसद रवि किशन ने निजी विधेयक लाया था जिसका समर्थन छपरा सांसद राजीव प्रताप रुढी ने किया था , पर दुर्भाग्य यह है कि सबने जनता से किए वादे को एक बार सवाल उठाकर सिर्फ खानापुर्ती किया।


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          कई बार सरकारों ने इस बाबत आश्वासन भी दिया, बहसें हुई, लेकिन नतीजा सिफर। इस बीच भोजपुरी भाषियों से कम संख्या बल वाले नेपाली और मैथिली भाषा तक को आठवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया, लेकिन भोजपुरी का इंतजार खत्म न हुआ। कभी बोली -भाषा के भेद का पाठ पढ़ाकर तो कभी नियमों की अस्पष्टता का हवाला देकर भोजपुरी भाषियों की मांग पूरी नहीं होने दी गई। बिहार सरकार ने मार्च 2017 में भोजपुरी को द्वितीय भाषा का दर्जा दे दिया, भारत से अलग मॉरीशस की पहल पर यूनेस्को ने भोजपुरी संस्कृति के 'गीत-गवनई' को सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया, लेकिन केंद्र की सरकारों ने कभी कोई ठोस प्रयास नहीं किया। विश्व में करीब 8 देश ऐसे हैं, जहा भोजपुरी धड़ल्ले से बोली जाती और सुनी जाती है। नेपाल में नेपाली भाषा के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली दूसरी भाषा है।जून 2011 में मॉरीशस की संसद में भोजपुरी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया। वहा के स्कूलों -मीडिया में भी इस भाषा का भरपूर इस्तेमाल होता है। इसी तरह भोजपुरी फिजी की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। यहा भोजपुरी को फिजियन हिंदी या फिजियन हिन्दुस्तानी के नाम से जाना जाता है।


          पिछले कुछ सालों से भोजपुरी के विरोध में भी कुछ लोग शामिल हो गए है। उनका तर्क है कि भोजपुरी के मान्यता मिलने से हिंदी कमजोड़ होगा लेकिन भाषा वैज्ञानिक एवं आलोचक डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह ऐसा नही मानते है। वे कहते है - "बोलियां नदी हैं, हिंदी नहर है. नहर का निर्माण होता है लेकिन नदियों का स्वत: निर्माण होता है। भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि बोलियों में हिंदी के शब्द नहीं आए है बल्कि इन बोलियों से शब्द हिंदी में गए हैं । यानी हिंदी का निर्माण हुआ है। बोलियों का निर्माण नहीं हुआ है।अब नहर में पानी नदियों से आता है।अगर नदियां सूख जाएंगी तो नहर भी सूख जाएंगी।इसलिए नहर को बचाने के लिए ज़रूरी है कि नदियों को बचाया जाए ।अगर हमें हिंदी को बचाना है तो बोलियों को बचाना होगा. लोक बोलियों के विकसित होने से हिंदी का विकास होगा।"


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            भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो निसंदेह उसके सुखद परिणाम होंगे। एक तो भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा हासिल हो जाएगा और दूसरे, भोजपुरी भाषा से जुड़ी ढेरों संस्थाएं अस्तित्व में आएंगी जिससे क्षेत्रीय भाषा का विकास होगा और साथ ही कला, साहित्य और विज्ञान को समझने-संवारने में मदद मिलेगी। संवैधानिक दर्जा मिलने से भोजपुरी भाषा की पढ़ाई के लिए बड़े पैमाने पर विश्वविद्यालय, कालेज और स्कूल खुलेंगे जिससे कि रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी।  अब प्रधानमंत्री द्वारा भोजपुरी ट्वीट किया गया तो बिहार के भोजपुरी भाषी लोगों के बीच फिर से यह चर्चा तेज हो गयी है कि जब भी चुनाव आता है तब भाजपा एवं इसके मंत्रियों को भोजपुरी, छठ व बिहार की अन्य लोककलाएं क्यों याद आने लगती है। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री जी को चुनाव के समय ही भोजपुरी की याद क्यों आती है? क्या भोजपुरी सिर्फ वोट बैंक की भाषा बन के ही रहेगी? अगर केंद्र सरकार को भोजपुरी पसन्द ही है फिर अब तक 8वी अनुसूची से दूर क्यो है?

         
                   --  नृपेन्द्र अभिषेक नृप