जागरुकता से चमकी और कोरोना को अपने क्षेत्र से रखती हैं दूर सुनीता

जागरुकता से  चमकी और कोरोना को अपने क्षेत्र से रखती हैं दूर सुनीता

शीलाा चन्द्रा 


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सुनीता के क्षेत्र में न कोरोना मरीज मिले हैं न ही एईएस के ।

2005 से आशा के रुप में कार्यरत हैं सुनीता ।


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परिवार और काम को एक समान देती हैं ।

   कोरोना संक्रमण ने लोगों की कार्यशैली को बदल कर रख दिया गया है। संक्रमण के आक्रामक रवैये को देखते हुए लोगों ने घरों से काम करना ही उचित समझा। इन सब के बीच कुछ लोग एसे भी थे जिनकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं दिखा वरन उन्होंने काम के प्रति अपनी चपलता को और बढ़ा दिया। पहले से ज्यादा लोगों से मिलना, कोरोना से बचने के लिए लोगों को सुझाव देना, प्रवासियों को खोज कर उन्हें आइसोलेशन तक ले जाना जैसे महत्वपूर्ण काम किया। तभी तो उन्हें स्वास्थ्य का प्रथम सिपाही कहा जाता है।  ऐसी ही एक स्वास्थ्य की सिपाही का नाम है सुनीता। वह जिले के पश्चिमी सेरुकाही में कार्यरत हैं जो आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 93 और वार्ड संख्या 15 में आता है। 2005 से सुनीता आशा के रुप में कार्यरत हैं। 


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आसान नहीं दिनचर्या: 

सुनीता कहती हैं वह आशा के साथ वह एक मां और पत्नी भी हैं। ऐसे में उनकी दिनचर्या थोड़ी कठिन जरुर होती है पर अपनी इच्छाशक्ति से वह इसे पूरा कर लेती हैं। सुबह 9 बजे के लगभग घरेलू काम को निपटाकर वह अपने क्षेत्र में चल देती हैं। स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लेकर घरों में चर्चा करती हैं। गर्भवती और नवजातों के स्वास्थ्य की जानकारी लेती हैं। उचित सलाह देती हैं। वहीं कोविड के समय में सुनीता की जिम्मेवारी थोड़ी बढ़ गयी। इस बाबत सुनीता कहती हैं कोरोना के संक्रमण का भया किसे नहीं है । कोरोना की पहुंच उनके क्षेत्र में न हो, इसलिए वह दिन-रात लोगों को सतर्क करने में जुटी है. वह प्रतिदिन 25 घरों में जाकर लोगों को हाथ धोने के तरीके बताने के साथ मास्क और लॉकडाउन के नियमों के पालन करने को समझाती है। साथ ही वह खुद भी पूरी तरह से कोरोना के प्रति सजग रहती है. 


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14 प्रवासियों की की पहचान :

 


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सुनीता कहती हैं लॉकडाउन के दौरान जो प्रवासी खुद के प्रयास से घरों में आ जा रहे थे। उसकी जानकारी सरकार के पास नहीं होती थी, खतरा भी इन जैसे लोगों से ही ज्यादा था। वह गृह भ्रमण कर कुल ऐसे 14 प्रवासियों की पहचान की जिनमें कोरोना के लक्षण थे एवं उनका टेस्ट करवा कर उन्हें आईसोलेशन सेंटर में भिजवाई. उन्होंने बताया बाहर से आने वालों पर उनकी खास नजर रहती थी। इस दौरान कम पढ़े लिखे लोगों को समझाने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता था. लेकिन वह निरंतर लोगों को जागरूक करती रही. इसलिए आज कोरोना के असर के बीच भी उनका क्षेत्र कोरोना मुक्त है, जिसे सुनीता जागरुकता का ही असर मानती हैं। 

 

एईएस मुक्त भी रहा सुनीता का क्षेत्र:

 

सुनीता कहती हैं इस बार कांटी प्रखंड से केवल दो बच्चे ही एईएस से प्रभावित हुए हैं. वह 2005 से ही एईएस पर लोगों के बीच जागरुकता फैला रही हैं. तीन वर्षों से उनके क्षेत्र में एईएस के मरीज नहीं मिले हैं। उनके क्षेत्र में लोगों को मालूम है कि क्या करें कि उनके बच्चे को एईएस न हो। यह बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भी है।