भारत के समक्ष चीन की चुनौतियाँ: नृपेंद्र अभिषेक नृप

भारत के समक्ष चीन की चुनौतियाँ: नृपेंद्र अभिषेक नृप

"कुछ भी स्थिर नहीं है, निरन्तर बदलते इस जमाने में , कूटनीति में देर नहीं लगती ,पास से दूर, दूर से पास आ जाने में ।।" भारत और चीन, जो कि विश्व की जनसख्या के एक-तिहाई भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों ही एक-दूसरे के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हैं, क्योंकि राजनीतिक सोच के टकराव और रणनीतिक उद्देश्यों के चलते दोनों ही एक-दूसरे पर संदेह करते हैं । भारत व चीन एक लम्बी अवधि से एक-दूसरे को सामरिक, आर्थिक एवं कूटनीतिक दृष्टि से पीछे करने के लिए प्रयत्न करते आ रहे हैं तथा एशिया में अपने वर्चस्व को लेकर उलझ रहे हैं । आज के राजनीति में चल रहे संक्रमण काल में भारत-चीन संबंधों की नई पहल का महत्व दोनों देशों के हितों के लिए ही नहीं, बल्कि तृतीय विश्व के विकासशील देशों के हितों के लिए भी आवश्यक है । अमरीका को एशिया में नये समीकरणों की तलाश में है । इसी परिपेक्ष्य में भारत अमेरिका संबंध प्रगाढ़ अवस्था मे आ चुका है। अमरीका अपनी दूरगामी रणनीति के तहत् चीन को घेरने के प्रयास लगा है और अपनी दादागिरी के बल पर चीन पर अपना अंकुश लगाना चाहता है । परिस्थिति यह है कि चीन इस समय एशिया की एक महान शक्ति के रुप में उभरा है । 


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चीन से आए दिन सीमा पर तनातनी की नौबत आ ही जा रही है। जिस तरह से अभी दोनो ओर से सेनाओं को बॉर्डर पर भेजा गया था वो इसका उदाहरण है। वैसे चीन अभी कोरोना के कारण वैश्विक स्तर पर घिरा हुआ है और वो बाकी सबको परेशान कर रहा है। उसी का अंजाम सीमा पर गरमाहट के रूप में देखी जा सकती है। फिलहाल चीन आंतरिक मामलों में भी उलझा हुआ है जिससे चीनी नागरिकों का ध्यान भटकाने के लिए सीमा पर तनाव बढ़ाने से बाज नही आ रहा है। 
चीन भारत द्वारा सिमा पर अवसंरचना मजबूत किए जाने आए काफी खफा जो उसके तीखी प्रतिक्रिया का एक वजह है। हालांकि खुद चीन सीमाओं पर बेहतर इंफ़्रा कर चुका है और भारत के करने पर टाँग अड़ा रहा है। जिस तरह से चीन ने एक वीडियो जारी कर दिखाया है कि चीनी सैनिक लद्दाख की ओर मूव कर रहे है वो भारत के लिए चिंतनीय है। चुकी चीन एक एक ऐसा देश है जो को हिंदी चीनी भाई भाई के बाद युद्ध मे झोंक देता है तो ऐसे में उससे सबक ले कर पहले से ही तैयार रहने की जरूरत है। इसके बावजूद भी युद्ध की उम्मीद नगण्य ही है। 

चीन के इस तनातनी की कुछ वजहें कूटनीतिक भी हैं। दरअसल, चीन अपने को विश्व की एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करने की कवायद में जुटा हुआ है। अपने पड़ोस में इस रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट उसे भारत ही नजर आता है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान अपने हितों के हिसाब से दूसरे देशों से व्यापारिक और सामरिक संबंध स्थापित किए हैं। चीन इसे अपने लिए चुनौती मानता है। उसे डर है कि भारत के जरिए पश्चिमी देश उसे घेरने की कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए उसने हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ कई कदम उठाए हैं। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता के मसले पर वह भारत की राह में रोड़े अटका रहा है। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी गुटों के सरगनाओं को वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने की भारतीय कोशिशों को भी उसने कई बार संयुक्त राष्ट्र में वीटो का इस्तेमाल करके नाकाम किया था । चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को लेकर भी भारत से चीन के रिश्ते सहज नहीं हैं।


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भारत चीन रिश्तों का इतिहास व्यापारिक और राजनीतिक संबंध प्राचीन काल से रहे है। वर्ष 1949 में चीन की स्थापना के अगले वर्ष भारत ने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए और 1950 के दशक में चीन और भारत के संबंध इतिहास के सबसे अच्छे दौर में थे। 1954 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु तथा तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई द्वारा सह अस्तित्व के लिए प्रतिपादित पंचशील सिद्धांत दोनों देशों के बीच सहयोग एवं सम्मान हेतु स्थापित किया गया । पंचशील के पाँच सिद्धांतों में एक-दूसरे की अखण्डता व सम्प्रभुता का सम्मान, अनाक्रमण, समानता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा एक-दूसरे के आतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना शामिल था । पंचशील सिद्धांत को दरकिनार करते हुए चीन ने 1962 के युद्ध के दौरान पूर्वी क्षेत्रों के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया। हालाँकि युद्ध विराम के बाद वह पहले वाली स्थिति पर तो चला गया लेकिन उसने प्रदेश में लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर की संपूर्ण क्षेत्र पर अपने दावे की गुहार लगाई। भारत चीन युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी समय के लिए खट्टे हो गए थे।


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चीन से मिले इस गहरे जख्म के बाद दोनों देशों के रिश्तों में लगभग डेढ़ दशक तक ठंडापन रहा जो 1970 के दशक के उत्तरार्ध में केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनने पर कुछ हद तक खत्म हुआ। दोनों देशों की सरकारों के प्रयासों से दोनों के बीच एक बार फिर राजदूत स्तर के राजनयिक रिश्तों की बहाली हुई। तब से लेकर अब तक दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते भी बने हुए हैं । एक बात अहम है कि भारत चीन के सीमा विवाद के कारण व्यपारिक रिश्तों में कभी मन मुटाव नही हुआ। हालांकि भारत मे चीनी वस्तुओं के बहिस्टार का मुद्दा काफी तूल पकड़ चुका है लेकिन यह कितना सफल होगा यह भविष्य के गर्भ में है। क्योंकि इसके पहले भी ऐसी बाते लोगो के बीच उठती रही है। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ऐसे में भारत व्यापारिक सम्बद्ध तोड़ना नही चाहेगा। हालांकि व्यपारिक घटा को दूर करने की एक बड़ी चुनौती भारत के सामने बनी हुई है। 

सीमा विवाद के बाद भी व्यापार के क्षेत्र में दोनों देशों के सम्बन्ध मजबूत हैं। भारत सबसे ज्यादा आयात चीन से ही करता है। इसके अलावा कई चीनी कंपनियां भारत में व्यापार कर रही हैं। चीन की मोबाइल कंपनियां जैसे ओप्पो, विवो आदि के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है। भारत चीन व्यापार के क्षेत्र में एशिया की सबसे बड़ी दो महशक्तियां है। भारत का चीन से व्यापार जहाँ 1999-2000 में 1825 मिलियन डॉलर था, जो 2020 तक आते आते लगभग 68 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसके निरन्तर बढ़ते रहने कई सम्भावना है । इसके साथ ही व्यापारिक वीजा की अवधि भी बढ़ाई गई है, यद्यपि व्यापारिक सम्बन्धों को लेकर आपसी मतभेद रहा है कि अपने सस्ते माल से भारत के बाजार को भर रहा है, किन्तु भारत ने इसकी परवाह न करते हुए भूमण्डलीकरण के इस दौर का एक अभिन्न अंग मानते हुए इसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया । 
दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी वाले दोनों देशों के बीच बाजार व व्यापार की संभावनाएं इतनी विशाल हैं कि आगामी कुछ वर्षों में साझा बाजार स्थापित हो सकता लेकिन इस व्यापार को साझा बाजार के रुप में विकसित करने के लिए संयुक्त रुप से समझदारी व संयम के साथ काम लेने की आवश्यकता है ।


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चीन के साथ भारत का सीमा विवाद प्राचीन काल से ही रहा है। जिसका उपचार किसी भी सूरत में तुरंत संभव नहीं है। कई बार किए गए प्रयासों के बाद भी सीमा विवाद समाप्त करने के संदर्भ में कोई सार्थक व स्पष्ट नीति अभी तक नहीं बन पाई है। पूर्वी क्षेत्र में 1100 किलोमीटर लम्बी सीमा है, जिसे मैकमोहन रेखा कहा जाता है, जो अरुणाचल को तिबत से अलग करती है । इसके अन्तर्गत लगभग 5000 किलोमीटर भू-भाग विवादग्रस्त है, पश्चिमी क्षेत्र में दोनों देशों के मध्य स्थित 1600 किलोमीटर लम्बी जम्मू-कश्मीर सीमा रेखा चीन को सिक्यांग तथा तिब्बत के क्षेत्रों से करती है । इसमें लगभग 25,000 वर्ग किलोमीटर भू-भाग विवादित है जिसमें पेमोंग के निकटवर्ती अक्साई चीन तथा चिंग झील के निकटवर्ती अक्साई चिन तथा चिंग हेनम घाटी सम्मिलित हैं । पाकिस्तान ने तथाकथित चीन-पाक समझौते के तहत् पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हमारा 5180 वर्ग किलोमीटर भू-भाग गैर-कानूनी रूप से चीन को दे दिया है ।

चीन की ओर से सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील राज्य के रुप में सिक्किम गिना जा रहा है क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों से सटा हुआ है । पूर्वोतर के उग्रवादियों को चीन से हथियार व प्रशिक्षण मिलता रहा है । अत: सिक्किम में सीमा व्यापार के नाम पर चीन के प्रवेश करते ही भारतीय सुरक्षा तन्त्र पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने की आशंका से कभी इनकार नहीं किया जा सकता है । भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर दोनों की दोस्ती के बीच बहुत अवरोध है । चीन जान-बूझकर भारत के साथ सीमा विवाद को सुलझाने की उपेक्षा करता जा रहा है जो कि सम्बन्धों के सन्दर्भ में शुभ संकेत नहीं है ।


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पूर्वी लद्दाख में करीब एक महीने से सीमा पर जारी गतिरोध के समाधान के लिए भारत और चीनी सेना के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तरीय बातचीत हुई। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सीमा पर अप्रैल, 2020 से पहले वाली स्थिति बहाल होनी चाहिए। साथ ही भारत की ओर से कहा गया है कि हम अपनी सीमा के भीतर कोई भी निर्माण कार्य कर सकते हैं। चीन ने उत्तरी सिक्किम और उत्तराखंड में वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे कुछ क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति बढ़ाई है, जिसके बाद भारत भी अतिरिक्त सैनिकों को भेजकर अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। चीन द्वारा पैंगोंग सो इलाके के फिंगर क्षेत्र में भारत द्वारा एक महत्वपूर्ण सड़क निर्माण का तीखा विरोध मौजूदा गतिरोध के शुरू होने की वजह है। इसके अलावा चीन द्वारा गलवान घाटी में दरबुक-शायोग-दौलत बेग ओल्डी मार्ग को जोड़ने वाली एक सड़क के निर्माण के विरोध को लेकर भी गतिरोध है। पैंगोंग सो में फिंगर क्षेत्र में सड़क को भारतीय जवानों के गश्त करने के लिहाज से अहम माना जाता है। भारत ने पहले ही तय कर लिया है कि चीनी विरोध की वजह से वह पूर्वी लद्दाख में अपनी सीमावर्ती आधारभूत परियोजनाओं को नहीं रोकेगा। दोनों देशों के सैनिक 5 मई को पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग सो क्षेत्र में लोहे की छड़ और लाठी-डंडे लेकर आपस में भिड़ गए थे।


वैश्विक ताकत बनने के अपनी महत्त्वाकाक्षा को सबल देने के लिए भारत को ऐसी सैन्य क्षमता विकसित करने की जरूरत है जिसका प्रभाव अपने क्षेत्र से बाहर तक हो । हालांकि इसकी नौसेना पहले ही दूर-दूर तक अपनी छाप छोड चुकी है । हमारे देश पर चीन तीन अलग-अलग रास्तों के जरिए सामरिक दबाव बढा रहा है । यह देखते हुए कि चीन समझौते के लिहाज से क्षेत्र में यथास्थिति बरकरार रखने का इच्छुक नहीं है, भारत को ज्यादा यथार्थवादी, नवीनीकृत और कारगर सोच अपनानी होगी । वैश्विक पटल पर घिरा चीन भारत से युद्ध करेगा, ऐसा नहीं लगता। जो भी हो, पर यह भी नहीं भूला जा सकता कि चीन अतिक्रमणकारी है। भारतीय भूमि पर उसकी ताजा गतिविधियां और युद्ध जैसी हालात तैयार करना एक बार फिर साबित कर रही है कि सामरिक रूप से भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन ही है। चीन के रवैये से साफ है कि भारत को वैश्विक पावर बनने में पाकिस्तान से कहीं अधिक चुनौतियां चीन से ही मिलने वाली है। 


         -- नृपेन्द्र अभिषेक नृप